मीरा चरित भाग 99 से भाग 103 तक
|| श्रीकृष्ण ||
|| मीरा चरित ||
(99)
क्रमशः से आगे .............
🌿 मीरा और ललिता ने श्री गिरिराज जी की तरहटी में हुई लीला का दर्शन किया। मीरा ने देखा ........ गिरिराज धरण श्यामसुन्दर ने मुस्कराते हुए जब वर्षा उपरान्त सबको आश्वस्त करते हुए घर जाने को कहा तो माधवी की ओर भूल कर भी न देखा।
🌿 माधवी स्वयं को यूँ उपेक्षिता पा तड़प सी उठी-" अरी मैया ! यह कैसी उल्टी शिक्षा दी तैंने ? यह शिक्षा , यह लाज ही मेरी बैरन हो गई !" वह व्याकुल हो पुकार उठी - " क्षमा करो ठाकुर ! मुझ अबोध से भूल हुई। कृपा करो ! मैं ऐसा क्या करूँ.....जिससे आप प्रसन्न होवो .....अब यह माधुरी छवि मेरी आँखों से दूर न हो .....कृपा करो।" वह जहाँ थी वहीं अचेत सी गिर पड़ी।
🌿 अब की बार सरस-मीठी वाणी कानों में सुधा-सिंचन करने लगी-"भूल मान गयी है ,अत: दर्शन तो नित्य होंगे, पर हमारी अन्तरंग लीला में सम्मिलित न हो सकोगी । परिमार्जन (पश्चाताप) के लिए कलिकाल में जन्म लेकर भक्ति-पथ का अनुसरण करने पर शुद्ध होकर ही मुझे प्राप्त कर पाओगी ।" माधवी अचेत हो गयी ।
🌿 उस दिन के पश्चात माधवी का व्यवहार एकाएक परिवर्तित हो गया । अब नित्य प्रातः साँय मुरली-रव कानों में पड़ते ही अटारी पर चढ़ जाती, पुष्प वर्षा करती ।सखियों के संग जा-जा कर लीला-स्थलियों के दर्शन करती और उनकी बाते ध्यान से सुनती - आज कन्हैया ने किसका घड़ा फोड़ा, किसके घर माखन की कमोरी फोड़ी, किसकी चोटी खाट से बाँधी, किसके बछड़े को खोलकर दूध पिला दिया। इन विविध लीलाओं को सुन-सुन करके अकेले में अश्रु बहाती । सोचती मैं भी तो सबके साथ ही रहती हूँ परंतु मेरी मटकी को हाथ तक भी नहीं लगाया,,कभी मुझे चिढ़ाया भी नहीं,,और तो और कभी मेरी ओर ठीक से देखा तक नहीं ।
🌿 उसकी सास बार-बार पूछती-'कोई मांदगी लगी हैं क्या बहू ?'
कही दुखता हैं बेटी ?,तू ठीक से कुछ खाती-पीती भी नहीं ।पीहर की,मैया की याद आ रही हो तो कछु दिन वहाँ हो आ लाली !'
माधवी ने तुरंत उत्तर दिया-'ना मैया ! मोकू पीहर नाय जानों ।मैं तो स्वस्थ हूँ मैया ! आप कछु चिंता मत करबो करौ !' मीठा बोल सास को तो समझा लेती पर उसका ह्रदय ही जानता कि जिसकी मधुर छवि उसके मन प्राण में अटकी है , उसकी उपेक्षा , उसकी विमुखता को सहन करने में वह किस कष्ट में जी रही है। भीतर ही भीतर जैसे वह घुलती सी जा रही थी।
🌿 ऐसे में उसके प्राणाराध्य की चर्चा ही उसके प्राणों का आधार थी। ।गृह कार्यों से निवृत हो वह पद-सेवा के मिस अपने पति सुंदर के चरणों को गोद में लेकर बैठ जाती और,धीरे से कोई चर्चा चला देती - 'आज आपके सखा और आप.......? बस, उसके लिए इतना संकेत ही पर्याप्त था ।व्रज में तो सभी कृष्ण-चर्चा, कृष्ण-गुणगान के व्यसनी हैं। चर्चा आरम्भ हुई तो दोनों इतने निमग्न की रात्रि कब बीती, दोनों ही जान नहीं पाते । भोर होने पर ताम्रचूड की बाँग ही उन्हें सचेत करती ।
🌿 दिन बीत रहे थे इसी प्रकार ,और एक दिन वज्रपात हुआ - वृन्दावन में तो जैसे सबके पावँ तले धरती ही खिसक गई हो - पता लगा कि मथुरा से अक्रूर श्रीकृष्ण को लिवाने आया है - श्रीराधा रानी तो ठाकुर के लिये माला गूँथ कर यमुना किनारे प्रतीक्षा रत थी - श्रीकृष्ण के मथुरा गमन जाने का सुन उनकी अन्तरंग सखियों की स्थिति तो कहाँ तक वर्णन करें ? श्रीराधा रानी को कौन कैसे बताये ? ललिता जी स्वयं को सम्भाल प्रियाजी को नन्दभवन के बाहर राजपथ तक रथ के पास ले आई ।वहाँ तो समस्त ब्रज ही मानों आँसुओं में डूब रहा था। माधवी भी स्वयं की मर्यादा भूल राजपथ पहुँची - आँसुओं की झड़ी थमती न थी - " हाय ! जब श्यामसुन्दर यहाँ थे ,तो मैं बैरन लाज के जंजाल में फँसी रही ......जब सुध आई तो मेरे हिस्से में उपेक्षा ही आई ..... और अब मैं कैसे जीवन धारण करूँगी ? "
🌿 क्रूर अक्रूर, ब्रजेन्द्रनन्दन , ब्रज के प्राणाधार को लेकर मथुरा ले चला गया।
और इधर मीरा मुर्छित हो ललिता के चरणों में जा गिरी ।
क्रमशः ................
|| मीरा चरित ||
(100)
क्रमशः से आगे ...........
🌿 ललिता जू के साथ मीरा ने स्वयं का अतीत दर्शन करते हुये देखा......... क्रूर अक्रूर ब्रजेन्द्रनन्दन को रथ पर चढ़ा मथुरा ले गया। और सारा ब्रज ठाकुर के विरह की मानों गर्त में डूब गया हो।
🌿 इधर मीरा मूर्छित हो ललिता के चरणों में जा गिरी ।ललिताने गोद में लेकर दुलार से समझाया-"वह अमानिशा बीत गयी माधवी ! देख तो, जीवन प्रभात समीप है अब तो। '
जल पिलाने पर सचेत होकर उसने पूछा - "यह चम्पा..........?
"मेरे साथ आ ! बताती हूँ।" ललिता जी ने साथ चलने का संकेत करते हुए कहा ।
🌿 मीरा देख रही थी कि यहाँ की भूमि कहीं स्वर्ण, कहीं स्फटिक, कहीं हरितमणी और कहीं पुष्पराग की है। इसी प्रकार वृक्ष-वल्लरियां पुष्प ,पत्र और फल भी मणिमय, स्वर्ण और रजतमय ही है। विविध पुष्पों के सौरभ से प्रकृति महक रही है छहों ऋतुऍ सदा यहाँ प्रियालाल जी के भाव को समझ सदा सेवा सम्पादन को उपस्थित रहती हैं।
यमुना के घाट स्वर्ण और स्फटिक के बने हुए हैं। सीढ़ीयाँ कहीं प्रवाल और कहीं पन्ने की। पत्र, पुष्प ,लता, वृक्ष ,सबके सब मणिमय प्रकाशमय होते हुए भी अत्यंत कोमल हैं । जिस ओर भी दृष्टि जाय , सर्वत्र सुंदरता ,मधुरता, कोमलता , दिव्यता ही छायी है ।कभीकभी उसे सम्पूर्ण प्रकृति में प्रियालाल जू की ही झाँकी दिखाई पड़ती । वहाँ कुछ भी जड़ नहीं था ,सब चैतन्य , दिव्य एवं चिन्मय था जो युगल दम्पति के सुख के निमित्त हेतु लीला में आवश्यकता अनुसार कोई भी रूप धारण कर लेता था ।सखियाँ एवं श्री राधारानी की मधुरता ,उनके श्रीविग्रह की कोमलता अचिन्त्य थी -मानों वह सब चलित रत्नमय विग्रह हों। उनके कुण्डलों का प्रतिबिंब कपोंलों पर स्पष्ट दिखाई पड़ता।
🌿 सभी वृक्ष फूलों के भार से नमित हो मानों ललिता जू से सेवा का आग्रह कर रहे हों - जैसे कह रहे हो कि हमारे प्राणेश्वर एवं प्राणेश्वरी को शीघ्र वन विहार करा हमें कृतार्थ करो न सखी ! पशु पक्षी सब श्री श्यामसुन्दर के विरह में शिथिल गात होकर उनके समीप आ जाते , तब ललिता जू उन्हें हाथ से दुलारती हुई कहती - माधव शीघ्र ही आयेंगे और अपनी प्राणप्रिया के संग आकर तुम्हें दर्शनान्द अवश्य प्रदान करेंगें ।पर मीरा के स्पर्श से वे थोड़ा बचने की चेष्टा करते।
🌿 " अरे बाँवरो ! यह तो अपनी ही हैं। अपनी ही सखी है। हाँ ,हाँ ! किशोरीजू ने आश्वासन दिया है कि एक दिन फिर यह अन्तरंग लीला में सम्मिलित होंगी। देखो न , ऐसा न होता तो यह यहाँ कैसे होती भला ?" ललिता जी मीरा का हाथ थामकर मृग दम्पति , पक्षियों और शशकों पर फिराती। एक चिरैया मीरा के हाथ पर बैठकर स्नेह से सिर घुमा - घुमाकर संकेत कर आश्वस्त करने लगी।
🌿 ललिता जू के संग ही कुछ पद चलकर उसने देखा कि झरने के पास शिला पर एक अर्ध मूर्छित किशोरी पड़ी है। उसके दीर्घ कृष्ण केश भू -लुंठित बिखरे पड़े है और सुन्दर नेत्रों से आँसुओं की धार बह रही है। उसी समय चम्पा वहाँ आई ।उसने उस किशोरी को बाँहों में भरकर उठाया। मीरा ने देखा - वह किशोरी तो माधवी है।
🌿 " चम्पा ने उससे परिचय पूछा और यह जानकर कि वह सुन्दर की बहु है , प्रसन्न हुई। चम्पा ने स्नेह से कहा ," इस प्रकार धीरज खोने से कैसे चलेगा बहिन ! तुम अकेली ही तो नहीं हो। जो सबने खोया है , वही तुमने भी खोया है। यों धीरज खो दोगी तो कैसे बात बन पायेगी। जब श्यामसुन्दर मथुरा से आ जायेंगे तो क्या मुख लेकर उनके समक्ष जाओगी ?"
" दूसरी बहिनों से मेरी क्या समता बहिन! वे सब भाग्यशालिनी है - उन्होंने कुछ पाकर खोया है। मुझ अभागिनी ने तो पाने से पूर्व ही खो दिया। आप सबका घट उन्हें खोकर भी परिपूर्ण है और मैं दुर्भागिनी तो सदैव रीती की रीती ( ठाकुर के स्नेह से वंचित ) ही रही। "कहते कहते माधवी फूट फूट कर रो पड़ी।
क्रमशः ...................
|| मीरा चरित ||
(101)
क्रमशः से आगे .............
🌿 ललिता जू के साथ मीरा ने दिव्य वृन्दावन के दर्शन किये और साथ ही देखा निज का अतीत......माधवी अपने भाग्य पर स्तब्ध और दुखी है और चम्पा उसे सान्तवना दे रही है।
🌿 चम्पा ने माधवी को ढांढस बँधाते हुए कहा ," हाय ! श्री कृष्ण के मथुरा जाने से आज तो ब्रज में सब अपने-अपने दुर्भाग्यको सब से बड़ा समझ रही हैं , मानो दुर्भाग्यकी होड़ लगी हो, किन्तु तुम अपनी बात कहो तो मैं कुछ समझूँ। इन आँसुओं की ज़ुबां नहीं होती। मुख से कुछ तो कहो।"
🌿 माधवी के नेत्रों की बरखा रुकने में ही नहीं आती थी। चम्पा के बहुत अनुरोध - प्रबोध के बाद वह कुछ कहने का प्रयत्न करती तो होंठ फड़फड़ा कर रह जाते। चम्पा ने स्नेह से माधवी के केशो को संभाल कर बाँधा। चुनरी छोर भिगोकर मुँह पोंछा। ह्रदय से लगाकर प्यार भरी झिड़की दी - "अहा, कैसा रूप दिया है विधाता ने? इसे इस प्रकार नष्ट करने का क्या अधिकार है तुझे री? यह तो अपने ब्रज वल्लभ की सम्पति है, इसे........।"
बात पूरी होनेसे पहले ही माधवी बुरी तरह रो पड़ी, मानो प्राण निकल ही जायँगे। उसकी यह हालत देखकर चम्पा भी अपने को रोक नहीं पायी। उसके धैर्यने मानों हार मान ली थी। आँखे बरबस बहने लगी। यह सोचकर कि इस प्रकार तो यह मर ही जायगी, उसने अपने आपको सँभाला और स्नेह एवं अधिकार से कहते हुए उसका मुख ऊपर किया -"क्या है? मुझसे नहीं कहेगी? क्यों कहेगी भला ! परायी जो हूँ।" कहते हुए चम्पा के नेत्र भर आये।
"ऐसा मत कहो, मत कहो।" माधवीके कंठसे मरते पशु-सा आर्तनाद निकला। - "फिर कह ! पहले अपनी आँखोंको प्रवाह थाम, अन्यथा एक भी बात मैं समझ नहीं पाऊँगी।"
🌿 माधवी ने रूकते-अटकते शब्दों में भरे कंठसे सारी व्यथा ,अपनी दुर्भाग्य कथा कह डाली - "मेरा दुर्भाग्य सीमा-हीन है बहिन ! मैं प्रतिदिन निराशा के गहन गर्त में विलीन होती जा रही हूँ ! न जाने कलिकाल कितनी दूर हैं......न जाने .....कहां.....जाना.....होगा......कैसे.....किसके सहारे ......???? भवाटवी........की भयानक अँधेरी गलियों.......में अवलम्बहीन मैं........।" माधवी पुन: चम्पा की गोदमें सिर रख फूट - फूट करके रो पड़ी। चम्पा कुछ देर तक उसे गोदमें लिए बैठी , मन में सोचती रही ," सचमुच ऐसा प्रबल दुर्भाग्य तो ब्रज के पशु - पाहनका भी नहीं रहा कभी !! किन्तु इसे ऐसे भी कैसे छोड़ दूँ?"
🌿" सुन माधवी!" उसने कहा" कलिकाल चाहे कितनी ही दूर हो, तुझे चाहे जहाँ जाना पड़े, जैसे भी रहना पड़े, मैं तेरे संग चलूंगी और संग रहूँगी।बस अब रोना बंद कर ! श्यामसुन्दर चाहकर भी कभी किसी के प्रति कठोर नहीं हो पाते। अवश्य ही इसमें तेरा हित निहित है।और माधव की दया, करुणा , कोमलता, मधुरता, कृपा की घनीभूता स्वरूप है श्रीकिशोरीजू।चल, मेरे साथ चल। उनके चरणोंके दर्शन-चिंतन मात्र से ही विपत्ति का भय नष्ट हो जाता है। उठ !" उसने हाथ पकड़ कर कर उठाया।
🌿 " जीजी ! आपने मेरे लिए कलिकाल में, संसार के .........।"
"अरी चुप ! अब एक भी बात नहीं बोलेगी तू।बहिन ! मैं और तू एक ही माला के फूल हैं - कोई आगे तो कोई पीछे। हम सबका दुख समान है ।श्री किशोरीजू का सुख ही हमारा सुख है और उनका दुख ही हमारा दुख। हम सब उनकी हैं और उनके लिये ही हैं। "
🌿 चम्पा उसे लेकर बरसाने के राज महल में श्री किशोरी जू के पास गयी। प्रणाम के अनन्तर चम्पाके मुख से सबकुछ सुनकर उन्हों ने माधवी के सिर पर हाथ रखा-"मत घबरा मेरी बहिन ! अपनों को श्रीकृष्ण कभी निर आश्रित नहीं छोड़ते। प्रयोजन की प्रेरणानुसार अपनों को अपने से दूर करके वे उसके लिए स्वयं व्याकुल रहते है और क्षण-क्षण में उसकी सार-सँभाल करते है। तेरे साथ तो फिर चम्पा ने अपने को बाँध लिया है। ऐसा साथ सहज ही नहीं मिलता........."
"श्रीजू ! मेरे लिए जीजी ने अपनेको कैसी विपत्ति में डाल लिया है।" माधवी ने बीच में ही भरे गलेसे कहा-"आप इन्हें निवारित करें ।"
"ऐसा मत कह बावरी! यह साथ रहेगी तो कलिकाल के कंटक तुझे छूनेका साहस नहीं कर पायेंगे। प्राणेश्वर प्रतिक्षण तेरे तन - मन - नयन में बसे रहेंगें ।चम्पा तेरी दासी बनकर सेवा ही नहीं करेगी , अपितु इस जीवन यात्रा में तेरा पाथेय ( मार्ग दर्शक ) भी बनेगी। "
यह सब सुनकर माधवी " हा स्वामिनी ! हा स्वामिनी " कहती मूर्छित हो गई ।
🌿 यह सब देख श्रवण कर मीरा अतीत और वर्तमान को मिलाते हुये ललिता जी के साथ आगे बढ़ आई तथा राधारानी को प्रणाम कर रूँधे कण्ठ से बोली ," हे मेरी स्वामिनी ! इतनी अनुपम ममता , अगाध करूणा ,अपार कृपा ....... इस तुच्छ दासी पर !!!" कहते कहते मीरा श्रीकिशोरी जू के चरणों में गिर गई ।नेत्र जल से उनके चरण पखारने लगी। श्रीकिशोरी जू का वात्सलय पूर्ण कर - पल्लव उसके मस्तक पर उसे सहला रहा था - " यह देख , मेरी अन्तरंग एवं प्रिय सखी चम्पकलता ही तेरी चम्पा है। "
🌿 मीरा चम्पा को देखते ही उसके चरणों में प्रणाम करने बढ़ी कि चम्पकलता ने हँसते हुए उसे कण्ठ से लगा लिया और रागानुगा भक्ति का सार आधार तत्त्व स्वाभाविक ही बताते हुये कहा - " यहाँ हम सब सखियाँ हैं बहिन ! स्वामिनी हमारी है किशोरीजू। अतः चरण वन्दना , सेवा - टहल सब इनकी और इनके प्रियतम श्यामसुन्दर की ।"
क्रमशः .................
|| मीरा चरित ||
(102)
क्रमशः से आगे ................
🌿 पाँच वर्ष तक वृन्दावन में वास करते हुए मीरा व्रज में नित्य लीला का रस लेती रही। आरम्भ में कुछ समय तो ललिता उन्हें लेने आती। पर कुछ समय पश्चात् वह वहाँ के आह्वान पर स्वयं ही उठकर चल देती। और निर्दिष्ट स्थान पर पहुँच जाती।वहाँ रहकर मीरा ने असंख्य लीलाओ में सम्मिलित हो लीला-रस का आस्वादन किया ।उनका स्वभाव सर्वथा बदल गया था ।
🌿 चमेली को मीरा के स्वभाव में बदलाव देख आश्चर्य होता - 'पहले चित्तौड़ में बाईसा हुकम को भावावेश होता तो कभी-कभी आठ-आठ दिन तक वे अचेत रहती, किन्तु सचेत होने पर, वे अपनी दिनचर्या में लग जाती । चितौड़ में रहते समय भी सब दास-दासियों के पहनने-ओढ़ने, खाने-पीने और भाव-अभाव की खबर रखती। उत्सवो में सबके यहाँ प्रसाद पहुँचाने, पुरस्कार देने, गरीबो की सहायता करने और ब्राह्मणों को दान देने का उत्साह रखती ।विवाह, मरण आदि के अवसरों पर कुछ देने का हुक्म करती। चित्तौड़ से मेड़ते आ जाने पर भी ऐसा ही व्यवहार रहा ।किन्तु यहाँ वृन्दावन में जिस दिन से चम्पा लुप्त हुई हैं, इन्हें तो संसार जैसे सर्वथा विस्मृत हो गया हैं। "
" अब कभी नहीं पूछतीं कि किसी ने प्रसाद पाया या नहीं ,न ही तो इनको यह सोच है कि सब खाद्य सामग्री कहाँ से आती है , और न ही यह चिन्ता कि द्रव्य ( धन ) है कि समाप्त हो गया ?" चमेली मन ही मन सोचती - " बाईसा हैं तो यहाँ पर यहाँ नहीं। पूरे दिन वाह्य ज्ञान-शून्य बैठी रहती हैं और मुस्कराती हैं ,या लेटी रह बस अश्रु बहाती हैं। हम मुख में कुछ दे दें,तो जैसे-तैसे चबाकर निगल लेती हैं। जल-पात्र मुख से लगाये तो पी लेती हैं। कीर्तन के स्वर या संतो की उपस्थिति ही इन्हें सचेत करती हैं। ऐसे यह देह कितने दिना चलेगी ? किससे पूछें ?'
🌿 एक दिन उनको तनिक सचेत देख चमेली ने पूछा - " यह चम्पा कहाँ मर गयी बाईसा हुकम ?"
मीरा ने घबराकर उसके मुहँ पर हाथ रख दिया - "उनके लिये ऐसे शब्द ना बोल चमेली ! अपराध होगा।"
चमेली चकित नेत्रों से स्वामिनी की ओर देखने लगी और मन-ही-मन सोचा - ''चम्पा के लिये "उन " शब्द ?वह आदरणीया कबसे हो गयी ? इनके लिए अपनी बहिन जैसी बराबरी वाली से कुछ कहने पर अपराध कैसे लगेगा और क्यों लगेगा ?"
उसने सहमते हुए पूछा-"बाईसा, वह कहाँ चली गयी एकाएक, किसी से कुछ कह गयी क्या ?
मीरा ने गदगद् स्वर में कहा-"जहाँ से वे पधारी थी, वहीं वे चली गयी ।" चम्पा का स्मरण होते ही उनका देह रोमांचित हो उठा ।
मीरा के चम्पा के प्रति ऐसा हाव-भाव देख चमेली को लगा कि अभी मूर्छित हो गिर पड़ेंगी ।और कही चम्पा के पधारने की बात करते-करते मुझे भी आदरयुक्त सम्बोधन न करने लगे, इस भय से वो उनके सामने से हट गयी।
🌿 एक दिन उन्होंने अपने सेवक-सेविकाओं से वृन्दावन की महिमा का बखान करते हुए कहा-"यह वृन्दावन साधारण भूमि नहीं हैं, यहाँ ठाकुर जी की कृपा के बिना वास नहीं मिलता ।तुम किसी के प्रति मन-वचन और काया द्वारा अवज्ञा मत कर बैठना ।इन नेत्रों से जैसा दिखाई देता हैं, वैसा ही नहीं हैं। यह तो परम दिव्य-ज्योतिर्मय धाम हैं, इसके कण-कण में ,पेड़-पत्ते और प्रत्येक जन के रूप में स्वयं ठाकुर जी ही विराजमान हैं।"
🌿 भोजन-पान उचित मात्रा में न लेने के कारण मीरा की देह दिन-दिन क्षीण होती जा रही थी ।किन्तु उनका तेज, भक्ति का प्रताप और ह्रदय की सरसता उत्तरोत्तर बढती ही जाती थी । वे बहुधा देहाभास से शून्य ही रहती ।संतो-सत्संगियो के आने पर उन्हे कीर्तन द्वारा सचेत किया जाता था ।बार-बार चमेली से पूछती-'ललिता आयी ?'
धीरे-धीरे मीरा चमेली को ही ललिता मानने लगी ।चार-पाँच वर्ष में लोग भूल गये कि उसका नाम चमेली हुआ करता था ।मीरा उससे ऐसे स्थान और लोगो की चर्चा करती, जो उसकी समझ में किसी प्रकार नहीं आती। पर चमेली बहुधा इसी चिंता में रहती, कि यदि धन समाप्त हो गया तो, क्या खाया-पिया जायेगा,और कैसे संतो और अतिथियों का सत्कार होगा ?उसे कहीं कूल - किनारा दिखाई नहीं देता था ...... ऐसे ही पाँच वर्ष बीत गये ।
क्रमशः ................
|| मीरा चरित ||
(103)
क्रमशः से आगे ................
🌿 "माधवी !!! " एक रात श्यामसुन्दर ने कहा - " अब तू यहाँ नित्य लीला में न आकर भक्ति किया कर। तुम्हारे दर्शन ,स्पर्श , भाषण से लोगों का कल्याण होगा। तुम्हारा प्रभाव देखकर लोग भक्ति - पथ पर अग्रसर होने का उत्साह पायेंगे। अभी यहीं वृन्दावन में रहो , कुछ समय के पश्चात किसी अन्य स्थान पर जाने के लिए प्रेरणा प्राप्त करोगी। "
सिर झुका कर मीरा प्राणाराध्य की बात सुनती रही। प्राणों में एकाएक वियोग की असह्य पीड़ा से मीरा की पलकें ऊपर उठी। वह भाव और पीड़ा के सम्मिलित अथाह महासागर में भी बड़वानल सी सुलग उठीं। देखते ही देखते उसकी वह स्वर्ण वल्लरी सी देह सूख कर कृष्ण वर्णा हो गई और वह सूखे पत्ते सी धरती पर झर श्री श्यामसुन्दर के चरणों में गिर पड़ी । तुरन्त ही करूणासागर के मंगल चरणों के स्पर्श से उसे राहत मिली जैसे सुवासित , सुशीतल चन्दन का स्पर्श हुआ हो।
🌿 श्यामसुन्दर स्नेहाभिसिक्त स्वर से बोले ," बहुत ,बहुत कठोर हूँ न मैं मीरा !! तुझ सुमन सुकुमार के लिये कंटक - बिद्ध पथ पर चलने का विधान कर रहा हूँ। " कमल की पाँखुड़ी से खिले नेत्रों से आँसुओं की दो बूँदे स्वच्छ धुली ओस की बूँदो की भाँति....... चरणों पर पड़ी मीरा के मस्तक पर गिर पड़ी।
मीरा प्राणनाथ को कष्ट में देख विचलित हो गई - " नहीं ,नहीं प्रभु ऐसा न कहे। जो भी मेरे मंगल के लिए आवश्यक होगा, आप वही विधान मेरे लिए निश्चित करेंगे - यह मुझे पूर्णतः विश्वास है। आप .... आप निसंकोच कहें ...... आपकी आज्ञा शिरोधार्य प्रभु ! वह तो .......इन चरणों से दूर होने की आशंका का ही अपराध है ,मेरा नहीं ! मैं तो आपकी आज्ञा पालन के लिए प्रस्तुत हूँ। "
मीरा !! माधवी !!!" प्रभु ने मीरा को चरणों से ऊपर उठाया और भाव में विह्वल हो काँपते स्वर में बोले ," तू जब चाहेगी, मुझे अपने समीप पायेगी। पर अब तेरी वह अचेतन अवस्था नहीं रहेगी , बस इतना ही। सदा भावावेश में डूबे रहना भले ही तेरे लिए कितना ही रूचिकर हो , पर उससे दूसरों का क्या भला होना है ? मीरा , तेरे सचेत रहने से ही दूसरों के भावों को पोषण मिलेगा ।उनके प्रश्नों का तू समाधान कर पा उन्हें दिशा दे पायेगी ।तेरी सेवा उनका कल्याण करेगी , तेरा स्पर्श ..........। "
"यह लोकैष्णा ( लोक कीर्ति ) ...... ज़हर....... लगती...... है। "
🌿 " ऐसे भावावेश में डूबे रहने से केवल तुम्हें ही लाभ है... तुम्हारे आसपास के जीव तो तुम्हारे अनुभव से वंचित रह जायेंगे न ! और फिर तुझे कीर्ति आक्रान्त करे , इतना साहस उसमें नहीं है। " फिर मुस्कराते हुए ठाकुर बोले ," और फिर मेरे प्रिय भक्त की सुकीर्ति मुझे कितना सुख देती है ! और तुझे ज्ञात भी नहीं होगा और न ही उन्हें , जिनका कल्याण होगा। दोनों ही बेखबर रहेंगे ....तब तो ठीक है न ?"
थोड़ा सोचते हुये श्यामसुन्दर फिर मधु सिंचित वाणी में कहने लगे ," एक और भी सुप्रयोजन है ....इस देश का शासक तुम्हारे दर्शन से पवित्र होगा। और..... जानती है मीरा , तेरे सेवक - सेविकाएँ नित्य रो - रोकर मुझसे अपनी स्वामिनी के आरोग्य के लिए प्रार्थना करते हैं । " श्रीकृष्ण मुस्कुराये ।
" उन पर कृपा कब होगी प्रभु ? उन्होंने तो मेरी सेवा के लिए अपनी देह -गेह का मोह भी छोड़ दिया है ...... बस वे मेरी ही चिन्ता में व्यस्त और व्याकुल रहते है। "
🌿 " तेरा कथन मेरा कथन है , मेरे भक्त की सेवा मेरी सेवा है .....क्योंकि तू ,तू है ही नहीं है। तुझमें निरन्तर मैं ही क्रियाशील हूँ , अतः तेरे सेवकों के कल्याण में संदेह बाकी ही कहाँ रहा ?" - ठाकुर ने मीरा के सिर पर हाथ रखते हुये कहा । " और हाँ यह ले !" - एक चन्दन की कलात्मक छोटी सी मंजूषा मीरा की ओर बढ़ाई - " यह चमेली को दे देना ,जिसके कारण से वह चिंतित है उसका समाधान इसमें है ।"
🌿 तभी चम्पा ने आकर कहा ," आज के नृत्योत्सव में प्रथम नृत्य माधवी का हो , ऐसा श्री किशोरीजू का आग्रह है। "
मीरा ने स्वामिनी जू की आज्ञा पा प्रसन्नता से दोनों हाथ जोड़कर मस्तक से लगाये।
क्रमशः ............
🙏🏼🌹 राधे राधे 🌹🙏🏼
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✍🏽 WhatsApp या Facebook पर मीरा चरित का यह जो प्रसंग आता है, भाग 1 से लेकर भाग 123 तक, यह संक्षेप में है। जो मुख्य रूप से पुस्तक से लेकर लिखा गया है। लेकिन पुस्तक में और विस्तार से लिखा हुआ है और भी बहुत सारे प्रसंग पुस्तक में आपको मिलेंगे, जो कि बहुत ही रोचक है, भावुक कर देने वाला प्रसंग पुस्तक में आपको मिलेंगे। इसलिए निवेदन है कि मीरा चरित पुस्तक जरूर पढ़ें। और यदि आप पुस्तक मंगवाना चाहते हैं तो आप इस पते पर सम्पर्क कर सकते हैं।
श्री राधे...