मीरा चरित भाग 63 से भाग 68 तक

|| श्रीकृष्ण ||
|| मीरा चरित ||
(63)
क्रमशः से आगे.............

मीरा की भक्ति और विश्वास देख उदयकुँवर बाईसा के ह्रदय में विचारों का एक उफान सा उमड़ आया ।मन में आया - " भाभी म्हाँरा को एक बार भी ध्यान नहीं आया कि महाराणा उनसे कितने रूष्ट है ?मिथुला की मौत ने उन्हें चेतावनी नहीं दी कि उनकी भी यही दशा होने वाली है ? फिर भी कितनी निश्चिंत हैं भगवान के भरोसे ? कहते है , भक्त और भगवान दो नहीं होते , ये अभिन्न होते है, और इन्हीं भक्त का अनिष्ट करने पर राणाजी तुले है ।और मैं , मैं भी तो उन्हीं का साथ दिए जा रही हूँ ।यदि भाभी मर जाये तो मुझे क्या मिलने वाला है ? केवल पाप ही न ? और यदि नहीं मरी तो ? भगवान का कोप उतरेगा । "

उदयकुँवर के मन में स्वयं के लिये ग्लानि भर गई , वह सोचने लगी - " यह जन्म तो वृथा ही चला गया ।मेरे भाग्य से घर बैठे गंगा आई - और मैं मतिहीन राणाजी का साथ दे भाभीसा का विरोध कर अपने पापों की पोटली भारी करती रही ।चेत जा ...अभी भी प्रायश्चित कर ले उदा ! मानव जीवन अलोना बीता जा रहा है , इसे संवार कर प्रायश्चित कर ले ।तू लोहा है उदा ! इस पारस का स्पर्श पाकर स्वर्ण बन जायेगी ।यदि कपूर उड़ गया तो तू सड़ी खाद की तरह गंधाती रह जायेगी । दाजीराज और बावजी हुकम क्या पागल थे जो इन्हें सब सुविधाएँ देकर प्रसन्न रखने का प्रयत्न करते थे - उस समय राजकार्य भी ठीक से चलता था ।और अब सब अस्त-व्यस्त सा हो रहा है ।चेत.....उदा !अवसर बीतने पर केवल पछतावा ही शेष रह जाता है ....... ।"

भजन पूरा हुआ और मीरा ने कटोरा होंठों से लगाया ।तभी उदयकुँवर चीख पड़ी - " भाभी म्हाँरा ! रूक जाइये ।"

क्या हुआ बाईसा ?" मीरा ने नेत्र खोलकर पूछा ।
" यह विष है भाभी म्हाँरा ! आप मत आरोगो !" उसने समीप जाकर भाभी का हाथ पकड़ लिया ।

" विष ?" वह खिलखिला कर हँस पड़ी -"आप जागते हुये भी कोई सपना देख रही है क्या ? यह तो लालजीसा ने जगन्नाथजी का चरणामृत भेजा है । देखिये न, अभी तो पंडाजी भी मेरे सामने खड़े है ।"

" मैं कुछ नहीं जानती । यह ज़हर है , आप मत आरोगो ।" उदयकुँवर ने रूँधे हुये कण्ठ से आग्रह किया ।

" यह क्या फरमाती है आप !चरणामृत न लूँ ? लालजीसा को कितने दिनों बाद भगवान और भाभी की याद आई और मैं उनकी सौगात वापिस भेज दूँ ? और वो भी चरणामृत ? अगर विष था भी, तो अब प्रभु को अर्पण कर वैसे भी चरणामृत बन गया है ।आप चिन्ता मत करें बाईसा , मेरे प्रभु की लीला अपार है - जिसे वे जीवित रखना चाहे , उन्हें कौन मार सकता है ?आप निश्चिंत रहे ।"

दासियाँ भी हैरान थी ।पर मीरा ने देखते देखते कटोरा उठाया और पलक झपकाते ही खाली कर पंडाजी को लौटा दिया ।

मीरा ने फिर इकतारा उठाया और एक हाथ में करताल ले खड़ी हो गई ।चम्पा ! घुँघरू ला ! आज तो प्रभु के सम्मुख मैं नाचूँगी ।"
चम्पा ने चरणों में घुँघरू बाँधे और मीरा पद भूमि पर छन्न -छन्नाते हुए स्वयं को ताल दे गाने लगी ...........

🌿पग घुँघरू बाँध मीरा नाची रे ।
मैं तो मेरे साँवरिया की आप ही हो गई दासी रे।
लोग कहे मीरा भई बावरी न्यात कहे कुलनासी रे॥
विष को प्यालो राणाजी नेभेज्यो पीवत मीरा हाँसी रे।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर सहज मिलया अविनासी रे॥

क्रमशः ............

|| मीरा चरित ||
(64)
क्रमशः से आगे.............

मीरा को यूँ नृत्य करते देख दासियाँ आँखों में आँसू भरकर निश्वास छोड़ रही थी और उदयकुँवर बाईसा के आश्चर्य की सीमा न थी ।भजन पूरा होने पर मीरा ने धोक दी ।उदयकुँवर उठकर धीरे से बाहर चली गई ।

" बाईसा हुकम ! बाईसा हुकम ! " दासियाँ उदयकुँवर के जाते ही रोती हुई एक साथ ही अपनी स्वामिनी के चरणों में जा पड़ी - " यह आपने क्या किया ? अब क्या होगा ? हम क्या करें ?"

" क्या हो गया बावरी ! क्यों रो रही हो तुम सब की सब ? " मीरा ने चम्पा की पीठ सहलाते हुए कहा ।

" आपने ज़हर क्यों आरोग लिया ?"
मीरा हँस पड़ी । ज़हर कब पिया पागल ! मैंने तो चरणामृत पिया ।विष होता तो मर न जाती अब तक ।उठो, चिंता मत करो ।भगवान पर विश्वास करना सीखो । प्रह्लाद को तो सांपों से डँसवाया गया , हाथियों के पाँव तले कुचलवाया गया और आग में जलाया गया , पर क्या हुआ ?यह जान लो कि मारनेवाले से बचानेवाला बहुत बड़ा है ।"

" बाईसा हुकम ! हम सब अपने मेड़ते चले जायें", चम्पा ने आँसू ढरकाते हुये कहा ।

" क्यों भला ? प्रभु मेड़ते में है और चित्तौड़ में नहीं बसते ? यह सारी धरती और इसपर बसने वाले जीव भगवान के ही उपजायें हुये है ।तुम भय त्याग दो ।भय और भक्ति साथ नहीं रहते ।"

उधर जब राणा को जब पता लगा कि मीरा पर विष का कोई प्रभाव नहीं हुआ और ब्लकि वह तो भक्ति के उत्साह में निमग्न हो नृत्य कर रही है तो वह आश्चर्य चकित रह गया ।राणा ने तुरन्त वैद्यजी को बुला भेजा ।
वैद्यजी को देखते ही महाराणा उफन पड़े ," तुम तो कहते थे कि इस विष से आधी घड़ी में हाथी मर जायेगा , किन्तु यहाँ तो मनुष्य का रोम भी गर्म न हुआ ।"

" यह नहीं हो सकता सरकार ! मनुष्य के लिए तो उसकी दो बूँद ही काफी है मुझे बताने की कृपा करे हज़ूर ! मैं भी आश्चर्य में हूँ कि ऐसा कौन सा लोहे का मनुष्य है ?" वैद्यजी ने कहा ।

" चुप रह नीच ! "राणा ने दाँत पीसते हुए कहा-" मेरा ही दिया खाता है और मुझसे ही चतुराई ?जैसे तुझे पता ही नहीं कि भाभी म्हाँरा के लिए यह विष बनवाया था ,और वह तो आनन्द में नाच गा रही है ।"
वैद्यजी सत्य सुनकर भीतर तक काँप गये ।फिर हिम्मत जुटाकर बोले ," भक्तों का रक्षक तो भगवान है अन्नदाता ! जहाँ चार हाथवाला रक्षा करने के लिए खड़ा हो , वँहा दो हाथवालों की क्या बिसात ?अन्यथा मनुष्य के लिए तो इस कटोरे में शेष बची ये दो बूँदे ही काफ़ी है ।"

महाराणा गरज़ उठा-" मुझे भरमाता है ? ये दो बूँदे तू पी और मैं फिर जानूँ कि तेरी बातों में कितनी सच्चाई है ?"
वैद्यजी बहुत गिड़गिड़ाये ,"यह हलाहल है अन्नदाता ! मेरे बूढ़े माँ बाप का और छोटे बच्चों का कौन धणी है ? " पर राणा ने एक न सुनी ।वैद्यजी ने काँपते हाथों से कटोरा उठाया और भगवान से क्षमा याचना करते बोला ," हे नारायण ! तुम्हारे भक्त के अनिष्ट में मैंने सहयोग दिया , उसी का दण्ड हाथों-हाथ मिल गया प्रभु ! पर मैं अन्जान था ।मेरे परिवार पर कृपा दृष्टि बनाये रखना ।" उसने कटोरा उठाया, और जैसे ही शेष दो बूँदे जीभ पर टप-टप गिरी, वैद्यजी चक्कर खा गिर गये और आँखें फटी सी रह गई ।

क्रमशः .....................

|| मीरा चरित ||
(65)
क्रमशः से आगे ...............

उदयकुँवर बाईसा विक्रमादित्य महाराणा के कक्ष में पीछे खड़ी सब देख रही थीं । दोनों बार विष पीने का दृश्य उसकी आँखों के सामने घटा ।जिस कटोरे भरे ज़हर से मेड़तणीजी का रोयाँ भी न काँपा , उसी कटोरे की पेंदे में बची दो बूँदो से वैद्यजी मर गये ।मीरा की भक्ति का प्रताप और राणाजी की कुबुद्धि दोनों ही उदयकुँवर के सामने आ गई ।वह सोचने लगी - " इस बेचारे को क्यों मारा ? किसी कुत्ते याँ बिल्ली को पिलाकर क्यों नहीं देख लिया ।मैंने बहुत बुरा किया जो इस मतिहीन का साथ देती रही ।"

महाराणा ने पहले तो समझा कि वैद्य नखरे कर रहा है किन्तु जब गर्दन एक तरफ लुढ़क गई तो उसके मुख से निकला - " अरे ! यह क्या सचमुच मर गया ?"
उसने प्रहरी को वैद्यजी को उठा ले जाने के लिए उनके घर समाचार भेजा।

उदयकुँवर ने धीरेधीरे अपने महल की ओर पद बढाये ।वहाँ पहुँच कर दासी से कहा," तू कहीं ऐसी ज़गह जाकर खड़ी हो जा , जहाँ कोई तुझे देख न सके ।जब वैद्यजी के घर वाले उन्हें लेकर जाने लगे तो उन्हें कहना कि वैद्यजी को मेड़तणीजी के महल में ले जाओ, वह इन्हें जीवित कर देंगी ।"
वह स्वयं भी मीरा के महल की ओर चली ।" भाभी म्हाँरा ! मुझे क्षमा करें ।मैंने आपको बहुत दुख दिये है ।" उदा ने सुबकते हुए मीरा की गोद में सिर रख दिया ।

" यह न कहिये बाईसा! दुख सुख तो मनुष्य को अपने प्रारब्ध से प्राप्त होता है ।मुझे तो कोई दुख नहीं हुआ ।प्रभु के स्मरण से समय बचे तो दूसरी अलाबला समीप आ पाये "मीरा ने ननद के सिर पर स्नेह से हाथ फेरते हुये कहा ।

मुझे भी कुछ बताईये , जिससे जन्म सुधरे ।" उदयकुँवर आँसू ढरकाती हुई बोली ।
" मेरे पास क्या है बाईसा ! बस भगवान का नाम है , सो आप भी लीजिए ।प्रभु पर विश्वास रखिये और सभी को भगवान का रूप , कारीगरी या चाकर मानिये ।और तो मैं कुछ नहीं जानती ।ये संत महात्मा जो कहते है , उसे सुनिए और मनन कीजिए ।बस आप भगवान के चरणों को विश्वास से पकड़िये - वही सर्वसमर्थ है ।"

" मैं किसी को नहीं जानती भाभी म्हाँरा ।आप मेरी है और मैं आपकी बालक हूँ ।मेरे अपराध क्षमा करके मुझे अपना लें ।मैंने भगवान को नहीं देखा कभी ।मैं तो आपको जानती हूँ बस ।"उदयकुँवर ने रोते हुए कहा ।
" जब आपकी सगाई हुई , पीठी चढ़ी ,तब आपने जवाँईसा को देखा था क्या ? पर बिना देखे ही आपको उनपर विश्वास और प्रेम था न ?" मीरा ने समझाते हुए कहा - जैसे बिना देखे ही बींद पर विश्वास - प्रेम होता है , उसी तरह विश्वास करने पर भगवान भी मिलते है ।"

" किन्तु बींद को तो बहुत से लोगों ने देखा होता है और बात भी की होती है । इसी से बींद पर विश्वास होता हैं पर भगवान को किसने देखा है ?"
"यदि मैं कहूँ कि मैंने देखा है तो ? मैंने ही क्या , बहुतों ने देखा है उन्हें ।अन्तर केवल इतना है कि कोई कोई ही पहचानते है , सब नहीं पहचानते । "

उदयकुँवर मीरा की बाते सुन और उनका अविचलित विश्वास अनुभव कर स्तब्ध रह गई ।

मीरा ने तानपुरा ले आलाप ले तान छेड़ी .................

🌿म्हाँरा तो गिरधर गोपाल........"

क्रमशः ..............

|| मीरा चरित ||
(66)
क्रमशः से आगे...........

उदयकुँवर बाईसा मीरा से भक्ति ज्ञान की बातें श्रवण कर रही थी ,उसकी आँखों से आँसुओं की धारायें बहकर उसके ह्रदय का कल्मष धो रही थी ।तभी कुछ लोगों के रोने की आवाज़ से उनका ध्यान बँटा ।मीरा ने कहा," अरी गोमती ! ज़रा देख तो ! क्या कष्ट है ?"

" कुछ नहीं भाभी म्हाँरा ! आपको विष से न मरते देखकर राणा ने समझा कि वैद्यजी ने दगा किया है ।उन्होंने उस प्याले में बची विष की दो बूँदे वैद्यजी को पिला दी ।वे मर गये है ।लगता है उनका शव लेकर घर के लोग जा रहे होंगे ।" उदा ने कहा ।

" वैद्यजी को महाराणा जी ने ज़हर पिला दिया ।उनका शव लेकर घरवाले आपके पास अर्ज़ करने आये है " इधर से गोमती ने भी आकर निवेदन किया ।

" हे मेरे प्रभु ! यह क्या हुआ ? मेरे कारण ब्राह्मण की मृत्यु ? कितने लोगों का अवलम्ब टूटा ? इससे तो मेरी ही मृत्यु श्रेयस्कर थी " मीरा ने भारी मन से निश्वास छोड़ते हुए कहा ।

मीरा सोच ही रही थी कि वैद्यजी के घरवाले उनका शव लेकर आ पहुँचे । वैद्य जी की माँ आते ही मीरा के चरणों में गिर पड़ी है -" अन्नदाता ! हम अनाथों को सनाथ कीजिए ।हमें कौन कमा कर खिलायेगा ? महाराणा जी ने हमें क्यों ज़हर नहीं पिला दिया ? हम आपकी शरण में है ! याँ तो हमें इनका जीवन दान दीजिए अन्यथा हम भी मर जायेंगे ।"

वृद्ध माँ के आँसू देख मीरा की आँखें भी भर आई । कैसी भी स्थिति हो , उसे तो बस गिरधर का ही आश्रय था और सत्य में जिसको उसका आश्रय हो उसे किसी और ठौर की आवश्यकता भी क्या ? मीरा ने सबको धीरज रखने को कहा और इकतारा उठाया .............

🌿हरि तुम हरो जन की पीर ।
द्रौपदी की लाज राखी तुरत बढ़ायो चीर ॥
भक्त कारन रूप नरहरि धरयो आप सरीर।
हिरणकस्यप मार लीनो धरयो नाहिन धीर॥
बूढ़तो गजराज राख्यो कियो बाहर नीर ।
दासी मीरा लाल गििरधर चरनकमल पर सीर॥

चार घड़ी तक राग का अमृत बरसता रहा । मीरा की बन्द आँखों से आँसू झरते रहे ।सब लोग मीरा की करूण पुकार में स्वयं के भाव जोड़ रहे थे ।किसी को ज्ञात ही न हुआ कि वैद्यजी कब उठकर बैठ गये और वह भी तन मन की सुध भूल कर इस अमृत सागर में डूब गये है ।भजन पूरा हुआ तो सबने वैद्यजी को बैठा हुआ देखा ।उनके मुख से अपने आप हर्ष का अस्पष्ट स्वर फूट पड़ा ।उन सभी ने धरती पर सिर टेककर मीरा की और गिरधर गोपाल की वन्दना की ।चम्पा ने सबको चरणामृत और प्रसाद दिया ।वैद्यजी की पत्नी ने मीरा के चरण पकड़ लिये ।उसके मन के भावों को वाणी नहीं मिल रही थी ,सो भाव ही आँसुओं की धारा बनकर मीरा के चरण धोने लगे ।

" आप यह क्या करती है ?आप ब्राह्मण है ।मुझे दोष लगता है इससे ।उठिये ! प्रभु ने आपका मनोरथ पूर्ण किया है ।इसमें मेरा क्या लगा ? भगवान का यश गाईये । सबको स्नेह से भोजन करा और बालकों को दुलार करके विदा किया ।डयोढ़ी तक पहुँचते पहुँचते सबके हर्ष को मानो वाणी मिल गई - "मेड़तणीजीसा की जय ! मीरा बाई की जय ! भक्त और भगवान की जय !!!"

" यह क्या मंगला ! दौड़ कर जा तो उन्हें कह कि केवल भगवान की जय बोलें ।यह क्या कर रहे है सब ?"

" बोलने दीजिए भाभी म्हाँरा ! उनके अन्तर के सुख और भीतर के हर्ष को प्रकट होने दीजिए ।लोगों ने , राजपरिवार ने अब तक यही जाना है कि मेड़तणीजी कुलक्षिणी है ।इनके आने से सब मर-खुटे है ।उन्हें जानने दीजिये कि मेड़तणीजी जी तो गंगा की धारा है, जो इस कुल का और दुखी प्राणियों का उद्धार करने आई है " उदयकुँवर बाईसा ने कहा ।

क्रमशः ..................

|| मीरा चरित ||
(67)
क्रमशः से आगे ...........

"वैद्यराज जी जीवित हो गये हुकम !" दीवान ने महाराणा से आकर निवेदन किया ।

" हैं क्या ?" महाराणा चौंक पड़े ।फिर संभल कर बोले ," वह तो मरा ही न था ।यों ही मरने का बहाना किए पड़ा था डर के मारे ।मुझे ही क्रोध आ गया था , सो प्रहरी को उसे आँखों के सामने से हटाने को कह दिया ।भूल अपनी ही थी कि मुझे ही उसे अच्छे से देखकर उसे भेजना चाहिए था ।वह विष था ही नहीं - विष होता तो दोनों कैसे जीवित रह पाते ?"

सामन्त और उमराव मीरा को विष देने की बात से क्रोधित हो महाराणा को समझाने आये तो उल्टा विक्रमादित्य उनसे ही उलझ गया - " वह विष था ही नहीं , वो तो मैने किसी कारणवश मैंने वैद्यजी को डाँटा तो वह भय के मारे अचेत हो गये ।घर के लोग उठाकर भाभीसा के पास ले आये तो वे भजन गा रही थी ।भजन पूरा हो गई तो तब तक उनकी चेतना लौट आ गई ।बाहर यह बात फैला दी कि मैंने वैद्य ज़ीको मार डाला और भाभी जी ने उनको जीवित कर दिया ।"

महाराणा के स्वभाव में कोई अन्तर न था । उनको तो यह लग रहा था मानो वह एक स्त्री से हार रहे हो - जैसे उनका सम्मान दाँव पर लगा हो ।वे एकान्त में भी बैठे कुछ न कुछ मीरा को मारने के षडयन्त्र बनाते रहते ।एक दिन रानी हाँडी जी ने भी बेटे को समझाने का प्रयास किया ," मीरा आपकी माँ के बराबर बड़ी भाभी है, फिर उनकी भक्ति का भी प्रताप है ।देखिए , सम्मान तो शत्रु का भी करना चाहिए ।जिस राजगद्धी पर आप विराजमान है , उसका और अपने पूर्वजों का सम्मान करें ।ओछे लोगों की संगति छोड़ दीजिये ।संग का रंग अन्जाने में ही लग जाता है ।दारू, भाँग ,अफीम और धतूरे का सेवन करने से जब नशा चढ़ता है , तब मनुष्य को मालूम हो जाता है कि नशा आ रहा है , किन्तु संग का नशा तो इन्सान को गाफिल करके चढ़ता है ।इसलिए बेटा , हमारे यहाँ तो कहावत है कि " काले के साथ सफेद को बाँधे, वह रंग चाहे न ले पर लक्षण तो लेगा ही ।" आप सामन्तो की सलाह से राज्य पर ध्यान दें । आप मीरा को नज़रअन्दाज़ करें , मानो वह जगत में है ही नहीं ।"

उधर मीरा की दासियाँ रोती और सोचती ," क्या हमारे अन्नदाता (वीरमदेव) जी जानते होंगे कि बड़े घरों में ऐसे मारने के षडयन्त्र होते होंगे ।ऐसी सीधी , सरल आत्मा को भला कोई सताता है ? बस भक्ति छोड़ना उनके बस का काम नहीं ।भगवान के अतिरिक्त उन्हें कुछ सूझता ही नहीं ,मनुष्य का बुरा सोचने का उनके पास समय कहाँ ।?पर इनकी भक्ति के बारे में जानते हुये यह सम्बन्ध स्वीकार किया था अब उसी भक्ति को छुड़वाने का प्रयास क्यों ? छोटे मुँह बड़ी बात है पर ....... चित्तौड़ों के भाग्य से ऐसा संयोग बना था कि घर बैठे सबका उद्धार हो जाता , पर दुर्भाग्य ऐसा जागा कि कहा नहीं जाता ।दूर दूर से लोग सुनकर दौड़े दर्शन को आ रहे है और यहाँ आँखों देखी बात का भी इन्हें विश्वास नहीं हो रहा ।भगवान क्या करेंगे , सो तो भगवान ही जाने , किन्तु इतिहास सिसौदियों को क्षमा नहीं करेगा ।"

इधर मीरा भक्ति भाव मे सब बातों से अन्जान बहती जा रही थी ।भगवा वस्त्र और तुलसी माला धारण कर वह सत्संग में अबाध रूप से रम गई ।जब मन्दिर में भजन होते तो वह देह - भान भूल कर नाचने गाने लगती .........

🌿मैं तो साँवरे के रंग राची......

क्रमशः ............

|| मीरा चरित ||
(68)
क्रमशः से आगे ...........

राजमाता पुँवार जी मीरा को दी जाने वाली यातनाओं की भनक पड़ रही थी ।उन्हें मन हुआ कि एक बार स्वयं जाकर मीरा को मिल कर कहें कि वह पीहर चली जायें ।

मीरा के महल राजमाता पधारी और सस्नेह कहने लगी ," बेटी ! तुम्हें देखती हूँ तो आश्चर्य होता है कि तुम्हें राणाजी ने दुख देने में कोई कसर नहीं रखी , पर एक तुम्हारा ही धैर्य और भक्ति में अटूट विश्वास है जो तुम अपने पथ पर प्रेम निष्ठा से बढ़ती जा रही हो ।बस अपने गिरिधर की सेवा में रहते हुये न तो अपने कष्टों का ही भान है और न ही भूख प्यास का ।"

मीरा ने सासूमाँ को आदर देते हुये कहा ," बहुत बार किसी काम में लगे होने पर मनुष्य को चोट लग जाती है हुकम ! किन्तु मन काम में लगे होने के कारण उस पीड़ा का ज्ञान उसे होता ही नहीं ।बाद में चोट का स्थान देखकर वह विचार करता है कि यह चोट उसे कब और कहाँ लगी , पर स्मरण नहीं आता क्योंकि जब चोट लगी , तब उसका मन पूर्णतः दूसरी ओर लगा था ।इसी प्रकार मन को देह की ओर से हटाकर दूसरी ओर लगा लिया जाय तो देह के साथ क्या हो रहा है , यह हमें तनिक भी ज्ञात नहीं होगा ।"

" पर बीनणी ! राणा जी नित्य ही तुम्हें मारने के लिए प्रयास करते ही रहते है ।किसी दिन सचमुच ही कर गुजरेंगे ।सुन-सुन करके जी जलता है, पर क्या करूँ ? रानी हाँडी जी के अतिरिक्त तो यहाँ हमारी किसी की चलती नहीं ।मैं तो सोचती हूँ कि तुम पीहर चली जाओ" राजमाता ने कहा ।
" हम कहीं भी जाये , कुछ भी करे, अपना प्रारब्ध तो कहीं भी भोगना पड़ेगा हुकम ! दुख देनेवाले को ही पहले दुख सताता है , क्रोध करने वाले को ही पहले क्रोध जलाता है, क्योंकि जितनी पीड़ा वह दूसरे को देना चाहता है, उतनी वही पीड़ा उसे स्वयं को भोगनी पड़ती है " मीरा ने हँसते हुये कहा - अगर मुझ जैसे को कोई पीड़ा दे और मैं उसे स्वीकार भी न करूँ तो ? आप सत्य मानिये , मुझे राणाजी से किसी तरह का रोष नहीं ।आप चिंता न करें ।प्रभु की इच्छा के बिना कोई भी कुछ नहीं कर सकता और प्रभु की प्रसन्नता में मैं प्रसन्न हूँ ।"

" इतना विश्वास , इतना धैर्य तुममें कहाँ से आया बीनणी ?"
इसमें मेरा कुछ भी नहीं है हुकम ! यह तो संतों की कृपा है ।सत्संग ने ही मुझे सिखाया है कि प्रभु ही जीव के सबसे निकट और घनिष्ट आत्मीय है ।वही सबसे बड़ी सत्ता है ।तब प्रभु के होते भय का स्थान कहाँ ? प्रभु के होते किसी की आवश्यकता कहाँ ?फिर हुकम ! संतों की चरण रज में, उनकी वाणी और कृपा में बहुत शक्ति है हुकम ।"

" तुम सत्य कहती हो बीनणी ! तभी तो तुम इतने दुख झेलकर भी सत्संग नहीं छोड़ती ।पर एक बात मुझे समझ नहीं आती ,भगवान के घर में यह कैसा अंधेर है कि निरपराध मनुष्य तो अन्याय की घानी में पिलते रहते है और अपराधी लोग मौज करते रहते है ।तुम नहीं जानती ,यह हाँडीजी राजनीति में बहुत पटु है ।हमारे लिए क्या इसने कम अंगारे बिछाये सारी उम्र और अब विक्रमादित्य को भी तुम्हें परेशान किए बिना शांति नहीं ।"

"आप मेरी चिन्ता न करें हुकम ! बीती बातों को याद करके दुखी होने में क्या लाभ है ? वे तो चली गई , अब तो लौटेंगी नहीं ।आने वाली भी अपने बस में नहीं , फिर उन्हें सोचकर क्यों चिन्तित होना ? अभी जो समय है , उसका ही उचित ढंग से उपयोग करें दूसरों के दोषों से हमें क्या ? उनका घड़ा भरेगा तो फूट भी जायेगा ।न्याय किसी का सगा नहीं है हुकम ! भगवान सबके साक्षी है ।समय पाकर ही कर्मों की खेती फल देती है ।अपने दुख , अपने ही कर्मों के फल है ।दुख सुख कोई वस्तु नहीं जो हमें कोई दे सके ।सभी अपनी ही कमाई खाते है , दूसरे तो केवल निमित्त है ।" 

मीरा ने सासूमाँ के आँसू पौंछ , उन्हें ज्ञान की बातें समझा कर सस्नेह विदा किया ।

क्रमशः ...............


🙏🏼🌹 राधे राधे 🌹🙏🏼
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✍🏽 WhatsApp या Facebook पर मीरा चरित का यह जो प्रसंग आता है,  भाग 1 से लेकर भाग 123 तक, यह संक्षेप में है। जो मुख्य रूप से पुस्तक से लेकर लिखा गया है। लेकिन पुस्तक में और विस्तार से लिखा हुआ है और भी बहुत सारे प्रसंग पुस्तक में आपको मिलेंगे, जो कि बहुत ही रोचक है, भावुक कर देने वाला प्रसंग पुस्तक में आपको मिलेंगे। इसलिए निवेदन है कि मीरा चरित पुस्तक जरूर पढ़ें। और यदि आप  पुस्तक मंगवाना चाहते हैं तो आप इस पते पर सम्पर्क कर सकते हैं।

श्री राधे...

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