मीरा चरित भाग 51 से भाग 56 तक

|| श्रीकृष्ण ||
|| मीरा चरित ||
(51)
क्रमशः से आगे...........

" ये भागवत पुराण सब सच्चे है क्या, बाईसा हुकम ?" एक बार मिथुला ने पूछा ।
"क्यों , तुझे झूठे लगते है क्या ?" मीरा ने हँसकर कहा ।
"इनमें लिखी बातें अनहोनी लगती है । रावण के दस माथे थे । ऋषियों में इतनी सिद्धि कि वह क्रोध में श्राप भी दे देते थे ।"

" कालचक्र के साथ संसार , इसके प्राणी और उनकी शक्तियाँ - रूप आदि सब कुछ बदलते रहते है ।आज हम जो कुछ देख रहे है, सम्भवतः पाँच सौ वर्षों के पश्चात लोग इसे झूठ याँ अनहोनी कहने लग जायें ।"

" सुना है बाईसा हुकम , कि प्रभु का विधान सदा मंगलमय होता है और उसी में जीव का भी मंगल निहित होता है ।फिर आप जैसी ज्ञानी और भक्त के साथ इतना अन्याय क्यों ? खोटे लोग आराम पाते है और भले लोग दुख की ज्वाला में झुलसते रहते है ।लोग कहते है कि धर्मात्मा को भगवान तपाते है , ऐसा क्यों हुकम ? इससे तो भक्ति का उत्साह ठंडा पड़ता है " मिथुला ने हिम्मत जुटाकर मीरा के पास अपनी गद्दी सरकाते हुये कहा ।फिर हाथ जोड़ कर बोली ," बहुत बरसों से मन की यह उथल पुथल मुझे खा रही है ।यदि कृपा हो तो ............।."

" कृपा की इसमें क्या बात है ।" मीरा ने कहा - "जो सचमुच जानना चाहता है उसे न बताना जाननेवाले के लिए भी दोष है ।"

" हाँ , भगवान के विधान में जीव का उसी प्रकार मंगल है , जिस प्रकार माँ के हर व्यवहार में बालक का मंगल निहित है ।वह बालक को खिलाती , पिलाती, सुलाती अथवा मारती भी है तो उसके भले के लिए ही, उसी प्रकार ईश्वर भी सदैव जीव का मंगल ही करते है ।"

" पर हुकम ! आपने तो कभी किसी का बुरा नहीं किया , फिर क्यों दुख उठाने पड़ रहे है ?"
" बता तो , चौमासे में बोयी फसल कब काटी जाती है ? " मीरा ने हँसकर पूछा ।
" आश्विन - कार्तिक में ।"
"और कार्तिक में बोयी हुई को ?"
" चैत्र-विशाख में ।""
तो फिर कर्मों की खेती तुरन्त कैसे पक जायेगी ? वह भी इस जन्म का कर्मफल अगले जन्म में मिलेगा ।कोई कोई प्रबल कर्म अवश्य तुरन्त फलदायी होते है ।"

किन्तु हुकम ! अगले जन्म तक तो किसी को याद ही नहीं रहता ।इसी कारण अपने दुख के लिए मनुष्य दूसरे लोगों को अथवा ईश्वर को दोषी ठहराने लगता है ।हाथों - हाथ कर्मफल मिल जाये तो शिक्षा भी मिल जाये और मन-मुटाव भी कम हो जाये ।"

" यह भूल न होती मिथुला ! तो अपने कर्मों का बोझ उठाये मनुष्य कैसे जी पाता ? यदि हाथों - हाथ कर्मफल मिल जाये तो उसे प्रायश्चित करने का अवसर कब मिलेगा ? भगवान के विधान में सज़ा नहीं सुधार है, मिथुला ! जैसे बालक गंदे कीचड़ में गिरकर पूरा लथपथ होकर घर आये , माँ के मन में अथाह वात्सल्य होते हुये भी जब तक माँ उसे नहलाकर स्वच्छ नहीं कर लेती , तबतक गोद में नहीं लेती ।अब नासमझ बालक यह न समझ पाये और रोये - चिल्लाये , माँ को भला बुरा कहे तो क्या माँ बुरा मानती है ? वह तो बालक को स्वच्छ करके ही मानती है ।और हम सब उस बालक जैसे ही है-जो अपना अच्छा बुरा नहीं समझते ।

क्रमशः ...................

|| मीरा चरित ||
(52)
क्रमशः से आगे ................

मिथुला, चम्पा और दूसरी दासियाँ धैर्य से अपनी बाईसा से ज्ञान की बातें सुन रही थी ।

मीरा ने फिर कहा," इस संसार में कहीं भी सुख नहीं है ।सुख और आनन्द जुड़वा भाई है - इनके मुख की आकृति भी एक सी है - पर स्वभाव एक दूसरे से विपरीत है ।मानव ढूँढता तो है आनन्द को, किन्तु मुख - साम्य के कारण सुख को ही आनन्द जानकर अपना लेता है ।और इस प्रकार ।आनन्द की खोज में वह जन्म जन्मान्तर तक भटकता रहता है ।"

" इनके स्वभाव में क्या विपरीतता है ?" मिथुला ने जिज्ञासा की ।

" आनन्द सदा एक सा रहता है ।इसमें घटना बढ़ना नहीं है ।पर सुख मिलने के साथ ही घटना आरम्भ हो जाता है ।इस प्रकार मनुष्य की खोज पूरी नहीं होती और जीवन के प्रत्येक पड़ाव पर वह सुखी होने का स्वप्न देखता रहता है ।" एक बात और सुन मिथुला , इस सुख का एक मित्र भी है और यह दोनों मित्र एक ही स्वभाव के है ।उसका नाम है दुख ।दुख भी सुख के समान ही मिलते ही घटने लग जाता है अतः यदि सुख आयेगा तो उसका हाथ थामें दुख भी चला आयेगा ।"

" आनन्द की कोई पहचान बाईसा ? ।उसका ठौर ठिकाना कैसे ज्ञात हो कि पाने का प्रयत्न किया जाये ।"

" पहचान तो यही है कि वह इकसार है , वह ईश्वर का रूप है ।ईश्वर स्वयं आनन्द स्वरूप है ।जैसे सुख के साथ दुख आता है , उसी प्रकार आनन्द से ईश्वर की प्रतीति होती है ।इसे पाने के बाद यह खोज समाप्त हो जाती है ।अब रही ठौर ठिकाने की बात , तो वह गुरु और संतो की कृपा से प्राप्त होता है ।उसके लिए सत्संग आवश्यक है ।संत जो कहे, उसे सुनना और मनन - चिन्तन करना और भी आवश्यक है ।"

मीरा धैर्य से मिथुला की जिज्ञासा के उत्तर में कितने ही भक्तों के प्रश्नों का समाधान करती जा रही हैं ।फिर मीरा ने आगे कहा," दुख और सुख दोनों का मूल इच्छा है और इच्छा का मूल मोह है ।एक इच्छा की पूर्ति होते ही उसी की कोख से कई और इच्छायें जन्म ले लेती है ।यही तृष्णा है और इसका कहीं भी अन्त नहीं ।"

मीरा ने थोड़ा रूककर फिर कहा," अब हम आनन्द का भी स्वरूप समझें ।जैसे हमें दूसरे सुखी दिखाई देते है , पर वे सुखी है नहीं ।उसी प्रकार जिनको आनन्द मिलता है ,वे बाहर से दुखी दिखाई देने पर भी दुखी नहीं होते ।"

क्रमशः ..............

|| मीरा चरित ||
(53)
क्रमशः से आगे...............

"बाईसा हुकम ! एक बात बतलाइये, क्या भक्त और अच्छे लोग पिछले जन्म में दुष्कर्म ही करके आये है कि वर्तमान में दुख पाना उनका भाग्य बन गया , और सभी खोटे लोग पिछले जन्म में धर्मवान थे कि इस जन्म में मनमानी करते हुये पिछले कर्मों के बल पर मौज मना रहे है ?"

" अरे नहीं , ऐसा नहीं होता ।शुभ , अशुभ और मिश्रित तीन प्रकार के कर्म होते है ।जैसे पापी केवल पाप ही नहीं, कभी जाने - अन्जाने में पुण्य भी करते है ,उसी तरह पुण्यात्मा के द्वारा भी कोई न कोई अन्जाने में अपराध हो जाता है ।तुमने देखा होगा मिथुला ! मातापिता अपनी संतान में तनिक सी भी खोट सह नहीं पाते है ।यदि दो बालक खेलते हुये लड़ पड़े तो माता - पिता अपने ही बच्चे को डाँटते है कि तू उसके साथ खेलने क्यों गया ? ठीक वैसे ही प्रभु अपने भक्त में तनिक सी कालिख भी नहीं देख- सह पाते ।" मीरा ने समझाते हुये कहा ।

फिर मीरा ने आगे कहा ," जब प्रारब्ध बनने का समय आता है तो भक्त के संचित कर्मों से ढूँढ ढूँढ करके बुरे कर्मफलों का समावेश किया जाता है कि शीघ्र से शीघ्र यह सब समाप्त हो जायें और वह प्रभु के आनन्द को प्राप्त कर सके ।दूसरी तरफ़ , पापियों पर दया करके शुभ कर्मो का फल प्रारब्ध -भोग में समावेशित किया जाता है कि किसी भी प्रकार यह सत्संग पाकर सुधर जाये ।क्योंकि भक्त के पास तो भगवान के नाम रूपी चिन्तामणि है जिसके बल से वह कठिन दुख और विपत्तियों को सह जाता है ।फिर प्रभु की दृष्टि उसपर से ज़रा भी नहीं हटती ।यही कारण है कि भक्त सज्जन दुखी और दुर्जन सुखी दिखाई देते है ।"

" जगत में इतने लालच है बाईसा हुकम ! यदि भक्त नामक जीव अशेष दुख उठाकर परिस्थितियों की शिला से फिसल गया ,तो वह बेचारा तो दोनों ओर से गया ।" मिथुला के ऐसा कहने पर दूसरी दासियों ने मुस्कराते हुये हाँ में हाँ मिलाई ।

मीरा ने इस संशय का समाधान करते हुये कहा," यदि इस पथ का पथिक विचलित होकर संसार के विषयों के प्रलोभन से अथवा परिस्थितियों की शिला से फिसल भी जाये तब भी भगवान उसके जीवन में कई ऐसे प्रसंग उपस्थित करते है , जिससे वह संभल जाये ।यदि वह नहीं संभल पाये तो अगला जन्म लेने पर जहाँ से उसने साधना छोड़ी थी , वहीं से वह आगे चल पड़ेगा ।"

" मिथुला ! कहाँ तक करूणासागर भगवान की करूणा का बखान करूँ - उसके अराध्य बार - बार फिसलने का खतरा उपस्थित ही नहीं होने देते ।अपने भक्त की संभाल प्रभु स्वयं करते है ।" मीरा ने कहा ।

क्रमशः ..................

|| मीरा चरित ||
(54)
क्रमशः से आगे .................

मीरा ज्ञान ,वैराग्य और भक्ति के कठिन विषयों को सरल शब्दों में अति स्नेह से समझाती हुई बोली ," मिथुला ! अगर भगवान परिस्थितियों में निज जन को डालते हैं तो क्षण क्षण उसकी संभाल का दायित्व भी स्वयं लेते है ।देखो, दुखों की सृष्टि मनुष्य को उजला करने के लिए हुई है ।क्योंकि दुख से ही वैराग्य का जन्म होता है और प्रभु सुख प्राप्ति के लिए किए गये प्रत्येक प्रयत्न को निरस्त कर देते है ।हार थककर वह संसार की ओर पीठ देकर चलने लगता है ।फिर तो क्या कहें ? संत, शास्त्र और वे सभी उपकरण , जो उसकी उन्नति में आवश्यक है , एक एक करके प्रभु जुटा देते है ।इस प्रकार एक बार इस भक्ति के पथ पर पाँव धरने के पश्चात लक्ष्य के शिखर तक पहुँचना आवश्यक हो जाता है , भले दौड़कर पहुँचे याँ पंगु की भांति सरकते-खिसकते पहुँचे ।"

जिसने एक बार भी सच्चे मन से चाहा कि ईश्वर कौन है ? अथवा मैं कौन हूँ , उसका नाम भक्त की सूची में लिखा गया ।उसके लिए संसार के द्वार बन्द हो गये ।अब वह दूसरी ओर जाने के लिए चाहे जितना प्रयत्न करे कभी सफल नहीं हो पायेगा ।गिर - गिर कर उठना होगा ।भूल - भूल कर पुनः भक्ति का पथ पकड़ना होगा ।पहले और पिछले कर्मों में से छाँट-छूँट करके वे कर्मफल प्रारब्ध बनेंगे जो उसे लक्ष्य की ओर ठेल दें ।"

" जैसे स्वर्णकार स्वर्ण को ,जब तक खोट न निकल जाये, तबतक बार -बार भठ्ठी में पिघला कर ठंडा करता है और फिर कूट-पीट कर, छीलकर और नाना रत्नों से सजाकर सुन्दर आभूषण तैयार कर देता है , वैसे ही प्रभु भी जीव को तपा तपा कर महादेव बना देते है ।एक बार चल पड़ा फिर तो आनन्द ही आनन्द है ।"

" परसों एक महात्माजी फरमा रहे थे कि कर्मफल याँ तो ज्ञान की अग्नि में भस्म होते है अथवा भोग कर ही समाप्त किया जा सकता है , तीसरा कोई उपाय नहीं है ।" चम्पा ने पूछा ," बाईसा हुकम ! भक्त यदि मुक्ति पा ले तो उसके संचित कर्मों का क्या होगा ?"

" ये कर्म भक्त का भला बुरा करने वालों में और कहने वालों में बँट जायेंगे ।समझी ?"

मीरा अपनी दासियों की जिज्ञासा से प्रसन्न हो मुस्कुरा कर बोली," आजकल चम्पा बहुत गुनने लगी है ।"

चम्पा सिर झुका कर बोली ," सरकार की चरण - रज का का प्रताप है ।लगता है , मैंने भी किसी जन्म में," ईश्वर कौन है ," यह सत्य जानने की इच्छा की होगी जो प्रभु ने कृपा करके आप जैसी स्वामिनी के चरणों का आश्रय प्रदान किया है ।"

क्रमशः ..................

|| मीरा चरित ||
(55)
क्रमशः से आगे ...................

राणा विक्रमादित्य का क्रोध मीरा पर दिन पर दिन बढ़ता जा रहा था ।रनिवास की स्त्रियाँ भी दो भागों में बँटी हुई थी - कुछ मीरा की ओर और कुछ कर्मावती बाई एवं उदयकुँवर बाईसा की ओर ।इस दल को महाराणा की भी शह मिली हुई थी ।कभीकभी तो कर्मावती कहती," जब से यह मेड़तणी का हमारे का यहाँ पाँव पड़ा है - कष्टों की सीमा नहीं , यह मरे तो राज्य में सुख शांति आये ।"

एक दिन उदयकुँवर के पति पधारे तो उन्होंने उलाहना दिया ," तुम्हारी भाभी बाबाओं के बीच नाचती गाती है - यह कैसी रीति है हिन्दू पति राणा के घर की ?"

उदयकुँवर ने दूसरे ही दिन मन की सारी भड़ास मीरा पर निकाल दी -"आपको पता है भाभी म्हाँरा ,आपके जँवाईसा पधारे है और आपके कारण मुझे उनके कितने उलाहने, कितनी बातें सुननी पड़ रही है ।"
मीरा ने शांत मन से कहा ," बाईसा ! जिनसे मेरा कोई परिचय याँ स्नेह का सम्बन्ध ही नहीं , उनके द्वारा दिए गये उलाहनों का कोई प्रभाव मुझ पर नहीं होता ।"

मीरा का शांत और उपेक्षित उत्तर सुन उदा मन ही मन जल उठी - " किन्तु भाभी आप इन बाबाओं का संग छोड़ती क्युँ नहीं ?सारे सगे - सम्बन्धियों में थू-थू हो रही है ।जब बावजी हुकम का कैलाश वास हुआ तब तो आप सोलह श्रृगांर कर आप शोक मनाती रही और अब ये तुलसी की मालाओं को हाथों और गले में बाँधे फिरती है जैसे कोई निर्धन औरत हो ।पूरा राजपरिवार आपके व्यवहार के कारण लाज से मरा जा रहा है ।"
मीरा ने उसी तरह शांत स्वर में कहा ," जिसने शील और संतोष के गहने पहन लिए हो, उसे सोने और हीरे - मोतियों की आवश्यकता नहीं रहती बाईसा ।"

उदयकुँवर और क्रोधित होकर कहने लगी ," किसी बहू - बेटी को कोई ढंग से सुसज्जित हो मिलने आये तो किसी को अच्छा भी लगे पर आपको तो मिलने वाले तो कोई करताल खड़काते , गेरूआ वस्त्र पहने ,विभूति लगाये , मुण्डित मस्तक , तुलसी और रूद्राक्ष की मालायें पहने, जटाओं वाले बाबाओं का ही झुंड आता दिखाई देता है जैसे शिव जी की बारात आ रही हो ।" उदा ने मुँह बिचकाया ।

मीरा मुस्कराई ,"बाईसा ! यहाँ शिव एकलिंग नाथ ही हैं तो उनकी बारात से लज्जित होना तो अच्छी बात नहीं है ।मैं तो अपने झरोंखों से झाँककर जब इन साधु बाबाओं को देखती हूँ तो फूली नहीं समाती, ब्लकि अपना भाग्य सराहती हूँ ।साधु-संग तो जगत से तार देता है बाईसा !" उदयकुँवर क्रोधित हो चली गई ।

इधर मीरा का यश बढ़ता जा रहा था ।मन्दिर में और महल की ड्योढ़ी पर यात्रियों और संतों की भीड़ लगी रहती । मीरा जब भी मन्दिर पधारती , मिथुला , चम्पा साथ ही रहती ।जो मीरा के भजन लिखना चाहते , वे चम्पा को घेरे रहते क्योंकि भजनों की पुस्तिका उसी के पास रहती ।मीरा ने ठाकुर जी को प्रणाम किया और फिर आये हुये संत भक्तों को भी । एक साधु ने मीरा के दर्शन कर गदगद कण्ठ से आग्रह किया ," माँ ! कुछ कृपा हो जाये........ ।"

मीरा ने विनम्रता से गाना प्रारम्भ किया ...........

🌿 राम कहिए, गोबिंद कही मेरे.....
....राम कहिए, गोबिंद कही मेरे।
🌿संतो कर्म की गति न्यारी 
..संतो
बड़े बड़े नयन दिए मृगनको,
बन बन फिरत उठारी।
🌿उज्जवल बरन दीनि बगलन को,
कोयल करती निठारी।
संतो करम की गति न्यारी...
🌿और नदी पण जल निर्मल कीनी
समुंद्र कर दिनी खारी..
.संतो कर्म की गति न्यारी...
🌿मुर्ख को तुम राज दीयत हो,
पंडित फिरत भिखारी..
संतो कर्म की गति न्यारी.....संतो।।

क्रमशः ..............

|| मीरा चरित ||
(56)
क्रमशः से आगे..........

इन्हीं दिनों मेड़ते से कुँवर जयमल और उनके छोटे पुत्र भँवर मुकुन्द दास मीरा को लेने चित्तौड़ पधारे ।दस वर्ष के मुकुन्द दास की वीरता इतनी कि राजपूती गौरव ही देह धारण कर आया हो । दोनों परिवार के विचार विमर्श से रत्नसिंह की छः वर्ष की पुत्री श्यामकुँवर का ब्याह मुकुन्द दास के साथ कर दिया ।नयी बहू उसकी धाय माँ और मीरा के साथ नई बहू का सारा समान मेड़ता रवाना हुआ ।

मुकुन्द दास ने हुकम दाता वीरमदेव जी को चित्तौड़ का सब वृतान्त सुनाते हुये महाराणा विक्रमादित्य की ओछे स्वभाव के बारे में बताया और कहा," वह सारा समय भाँड और गवैयो के साथ रागरंग में डूबे नशा करते है ।सारे राज्य की बागडोर हिली हुई है ।और राणाजी बुवासा और उनकी भक्ति से बहुत नाराज़ है ।"

" मेरे फूफासा ( भोजराज ) कैसे थे बाबोसा ?"
" क्या कहूँ बेटा ! जैसे शांत रस रूप में घुलकर एक हो जाये , जैसे सोने में सुगंध मिल जाये । जैसे कर्तव्य और भक्ति मिल जायें, वैसे ही रूप ,
गुण और वीरता का भंडार था मेरा जवाई ।जैसे तेरी बुवासा भक्ति करती है, कोई और होता तो कितने विवाह कर लेता । मेवाड़ के राजकुवंर को बीनणी की क्या कमी थी पर उन्होंने पहले से ही दूसरे विवाह के लिए मना कर दिया था ।श्याम कुंभ के पास जो मन्दिर है न, वह तेरे फूफोसा ने ही बुवासा के लिए बनवाया था ।"

मीरा इतने बरसों के बाद मेड़ता आई ।मायके में न चिन्ता करने वाली माँ थी और न पिता जी ।वह कुछ बरस पहले ही युद्ध में मातृभूमि के लिए वीरगति को प्राप्त हो गये थे । मेड़ता में आकर मीरा ने जगत का परिवर्तनशील रूप देखा ।जिस महल में उसका बचपन माँ के साथ बीता था उसमें जयमल और उनकी पत्नी रहती है ।छोटे छोटे बालक जवान हो गये थे और जवानों के विवाह और बालक हो गये ।दाता हुकम (वीरम देव जी) थोड़े थोड़े दूदाजी की तरह ही दिखने लगे थे ।वैसे ही दूदाजी के पलंग पर विराज कर माला फेरते हुये अपनी काली धोली दाढ़ी को सँवारते पोते पोतियों से बतियाते........ ।

मीरा को स्मरण हो आया अपना बचपन - जब पाँच बरस की मीरा आँखों में आँसू भरे पलंग के पास खड़ी पूछ रही है - "बाबोसा ! एक बेटी के कितने बींद होते है ?"

उसकी आँखों में आँसू और होंठों पर हँसी तैर गई । बाबोसा उसके सुघड़ शिल्पी , उन्होंने ही तो गढ़ा था उसे ।वे ही तो जगत में उसके पहले और सबसे बड़े अवलम्ब थे ।और दूसरे महाराजकुमार ( भोजराज ) , दोनों ही छोड़ गये ।

" दाता हुकम ! आप तो बाबोसा जैसे दिखने लगे है !" मीरा ने स्वयं को संभालते हुये कहा ।

" अब तो बुढ़ापा आ ही गया है बेटा ! चित्तौड़ के क्या हाल सुन रहा हूँ ।कहते है राणा जी राग-रंग में डूबे रहते है ।चौकियाँ भी सब ढीली है ।"
"बाबोसा ! राजमद सब पचा नहीं पाते ।"

वीरमदेव जी ने मीरा को नई नन्हीं बींदनी श्याम कुँवर का विशेष ध्यान रखने का कहा ताकि वह उदास न हो ।मीरा बाबोसा को प्रणाम कर निकली तो उसके पग स्वभावतः श्याम कुन्ज की ओर बढ़ चले ।

मीरा और गिरधर के आने से श्याम कुन्ज फिर से आबाद हो गया था, मानों उसके प्राण ही लौट आये हो ।मीरा ने पहले की तरह ही अपने गिरधर के लिए तान छेड़ी.........

🌿ऐ री मैं तो प्रेम दीवानी ........

क्रमशः .................


🙏🏼🌹 राधे राधे 🌹🙏🏼
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✍🏽 WhatsApp या Facebook पर मीरा चरित का यह जो प्रसंग आता है,  भाग 1 से लेकर भाग 123 तक, यह संक्षेप में है। जो मुख्य रूप से पुस्तक से लेकर लिखा गया है। लेकिन पुस्तक में और विस्तार से लिखा हुआ है और भी बहुत सारे प्रसंग पुस्तक में आपको मिलेंगे, जो कि बहुत ही रोचक है, भावुक कर देने वाला प्रसंग पुस्तक में आपको मिलेंगे। इसलिए निवेदन है कि मीरा चरित पुस्तक जरूर पढ़ें। और यदि आप  पुस्तक मंगवाना चाहते हैं तो आप इस पते पर सम्पर्क कर सकते हैं।

श्री राधे...

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